यदि किसी राष्ट्र में एक जिम्मेदार और कर्तव्य परायण प्रेस नहीं है,तो राष्ट्र प्रगति और समृद्धि नहीं कर सकता है। राष्ट्रिय प्रेस दिवस पर डॉo वीoकेo वर्मा
प्रेस की स्वतंत्रता के बिना राष्ट्रीय प्रेस दिवस का
उत्सव अधूरा-डाoवी.के.वर्मा
प्रेस क्लब बस्ती राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर संगोष्ठी में विमर्श
बस्ती। राष्ट्रीय प्रेस दिवस 16 नवंबर के अवसर पर गुरूवार को प्रेस क्लब सभागार में श्रमजीवी पत्रकार यूनियन उत्तर प्रदेश के जिलाध्यक्ष डा.वी.के.वर्मा के संयोजन में संगोष्ठी का आयोजन किया गया। डा.वर्मा ने कहा कि राष्ट्रीय प्रेस दिवस का उत्सव प्रेस की स्वतंत्रता का उत्सव मनाए बिना अधूरा है। इस दुनिया का कोई भी देश अपनी सीमाओं के भीतर और बाहर क्या हो रहा है,यह जाने बिना जीवित नहीं रह सकता। देश के प्रेस के लिए स्वतंत्र और जिम्मेदारी से काम करना बेहद जरूरी है।
डा.वर्मा ने कहा कि इस दुनिया का कोई भी देश अपनी सीमाओं के भीतर और बाहर क्या हो रहा है, यह जाने बिना जीवित नहीं रह सकता। देश के प्रेस के लिए स्वतंत्र और जिम्मेदारी से काम करना बेहद जरूरी है। यदि किसी राष्ट्र में एक जिम्मेदार और कर्तव्य परायण प्रेस नहीं है,तो राष्ट्र प्रगति और समृद्धि नहीं कर सकता है। राष्ट्रीय प्रेस दिवस पहली बार 1966 में मनाया गया था,जब प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) की स्थापना हुई थी और देश में इसका संचालन शुरू हो गया था।
पत्रकार पुनीत दत्त ओझा ने कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता सर्वोपरि है, क्योंकि यह शासकों (सरकार) और शासितों (नागरिकों) के बीच की खाई को पाटने में मदद करती है। इसके अलावा, यह सिस्टम की खामियों की पहचान करने में मदद करता है और प्रचलित मुद्दों के संभावित समाधान के साथ आता है, जिससे ‘लोकतंत्र के चौथे स्तंभ’ के शीर्षक को सही ठहराया जा सके। प्रेस की अन्य बेजोड़ विशेषताओं में से एक यह है कि यह लोकतंत्र के अन्य तीन स्तंभों - कार्यपालिका,विधायिका और न्यायपालिका के विपरीत आम आदमी की भागीदारी को बढ़ावा देती है। प्रेस हमें दुनिया से जोड़ता है ।
संगोष्ठी में मुख्य रूप से धर्मेन्द्र पाण्डेय,अरूण कुमार,राकेश गिरी,अमन पाण्डेय,राकेश त्रिपाठी,लवकुश सिंह,राकेश तिवारी, सर्वेश श्रीवास्तव,मो.कलीम,बबुन्दर यादव,जय प्रकाश उपाध्याय,कपीश मिश्र,राजेन्द्र उपाध्याय,राजेश कुमार पाण्डेय आदि ने अपने विचार रखे। संगोष्ठी में अनेक पत्रकार उपस्थित रहे।


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