सावधान , बस्ती शहर का सेहत ना बिगाड़ दे आरओ का केमिकल युक्त अवैध ' शुद्ध जल '
बस्ती। 5 मई शहर बस्ती में नलों से पर्याप्त व शुद्ध जल की आपूर्ति नहीं होने की वजह से शहर में आरओ के पानी की डिमांड बढ़ गई है। चूंकि इन दिनों भीषण गर्मी का दौर चल रहा है. इसलिए कमाई के फेर में गली-गली अवैध आरओ (रिवर्स ओस्मोसिस) प्लांट संचालित होने लगे हैं। स्वास्थ्य विभाग की बिना अनुमति के चल रहे इस अवैध कारोबार से जुड़े लोग शुद्धीकृत जल के नाम पर केमिकल युक्त पानी की होम डिलेवरी कर रहे हैं। घरों से लेकर दुकान और सरकारी कार्यालयों तक में सप्लाई होने वाले इस पानी को लोग सेहतमंद समझकर पी रहे हैं. लेकिन उन्हें शायद पता नहीं कि आरओ वाटर के नाम पर सिर्फ नल का पानी ऊंचे दामों पर बेचा जा रहा है। जिसकी शुद्धता की भी कोई गारंटी नहीं है।
शहर की कॉलोनियों से लेकर गांव-गिराव तक कैम्पर और कैन में बेचा जा रहा यह पानी आरओ मशीन से शुद्धिकृत होने के बजाए केमिकल युक्त है। जी, हां. शुद्ध पानी (आरओ वाटर) के नाम पर एक से दो रुपए प्रत्ति लीटर के भाव बिक रहा केमिकल युक्त पानी मले की कुछ देर के लिए आपका गला तर कर दे, लेकिन यह आपकी सेहत के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। आरओ-मिनरल वाटर के नाम पर लोगों को बीमारियां परोसी जा रही है। बिना लाइसेंस के आरओ प्लांट संचालित हो रहे हैं। जो शुद्ध केमिकल युक्त अशुद्ध पानी पिला रहे है।
बस्ती शहर में डेढ़ दर्जन से अधिक पानी के प्लांट
अकेले बस्ती शहर में करीब डेढ़ दर्जन से अधिक आरओ प्लांट बड़े पानी टंकी को गाडी पर रखकर खुला पानी बेच कर अपनी जेब भर रहे हैं। लेकिन खाद्य सुरक्षा अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं। दरअसल आरओ प्लांट व बोतलबंद वाटर प्लांट संचालित करने के लिए भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा मानक तय किए गए हैं, लेकिन अधिकारियों की उदासीनता के चलते अवैध आरओ प्लांट संचालित हो रहे
प्रावधान के अनुसार हर आरओ प्लांट में प्रयोगशाला के साथ दो केमिस्ट होना आवश्यक है। जो प्रतिदिन पानी की जांच करेंगे। तभी भारतीय मानक ब्यूरो के मानक पर पानी की गुणवत्ता सही साबित हो सकती है। लेकिन केमिस्ट व प्रयोगशाला होना तो दूर आरओ प्लांट के द्वारा पानी के खाली जारों की भी अच्छे से धुलाई नहीं की जाती। लिहाजा शहर में चल रहे एक भी आरओ प्लांट के पास भारतीय मानक ब्यूरो का एनओसी नहीं है। समय-समय पर फूड अधिकारी को करना है गुणवत्ता की जांच आरओ पानी प्लांट के लिए कई विभागों से एनजओसी जरूरी होता है। इसके बाद ही आरओ प्लांट को शुरू किया जा सकता है। आरओ प्लांट के लिए नगर पालिका परिषद, खाद्य संरक्षा आयुक्त, उद्योग विभाग, पर्यावरण सेंटर, वाटर बोर्ड तथा केंद्रीय उत्पाद विभाग से अनापति प्रमाण पत्र लेना जरूरी होता है। इसके साथ-साथ लाइसेंस जारी किया जाता है। जिसकी गुणवता की जांच समय-समय पर फूड विभाग के अधिकारी करते हैं। लेकिन सूत्रों का कहना है कि दो प्लांटों को छोड़कर कियी के पास एनओसी नहीं है। फर्जी रसीदों पर बेची जा रही है पानी की जार
फर्जी रसीदों के जरिए बनता है बिल
सूत्रों के अनुसार आरओ (रिवर्स ओसमोसिस) प्लांट द्वारा फर्जी रसीद के जरिए पानी को बेचा जा रहा है। जिसे सरकार को राजस्व का चूना लग रहा है। नाम न छापने के शर्त पर एक आरओ प्लांट में काम करने वाले कर्मी ने बताया कि कचहरी परिसर, गांधीनगर दक्षिण दरवाजा, सुर्तीहट्टी रेलवे स्टेशन एक जैसे है। स्थानों पर अवैध रूप से आरओ प्लांट संचालित हो रहें हैं। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्र गनेशपुर प्लास्टिक काम्पलेक्स, आसपास के इलाकों में कई आरओ प्लांट गैर नियम चल रहें है। आरओ प्लांटों से फिल्टर होकर निकलने वाले पानी की खपत प्रतिदिन डेढ़ लाख लीटर से दो लाख लीटर तक है। आरओ संचालकों द्वारा ठंडे पानी का कैम्पर 20 से 25 रुपए में और सादा पानी का कैम्पर 15 से 20 रुपए में बेचा जाता है
अधिकारियों का कहना है
फूड्स विभाग के अधिकारी ने बताया कि नियमानुसार पैकेजिंग ड्रिंक वाटर (बोतल बंद) या आईएसआई मार्का के पानी की जांच की जाती है। आरओ पानी (खुला जल) की जांच के लिए स्वास्थ्य विभाग अधिकृत नहीं है। फिर भी यदि किसी की शिकायत आती है, तो इस संबंध में पानी के सैम्पल की विशेष रूप से जांच की जाएगी।




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